ठंड का मौसम, सुबह-सुबह घूमने का मजा ही कुछ और होता है । कोहरे मे डूबा हुआ संसार, हर कदम पर एक नयी दुनिया जोड़ते हुए चलता जाता है। पेढ के पत्तों से झलकती हुई शीतल सी हरियाली, हवा मे घुली हुई वो मिट्टी की सुगंध, और चिड़ियो की दिल को सुकून पहुचाने वाली चहचहाट, मन मे ताजगी और उमंग भर देती है और ऐसा लगता है की ऐसी सुबह कभी खत्म ही न हो ।
कुछ बुजुर्ग, कुछ जवान, और कुछ जवानी के अंतिम चरण पर अपनी जवानी बचाने के लिए घूमते हुए लोग, छोटे-छोटे बच्चे कई परत कपड़ो मे स्कूल बस का इंतेजार करते हुए खड़े रहते है । और उस समय गरमा गरम चाय मिल जाए तो क्या बात हो । बस उसी आनंद को लेने के लिए कदम चाय की तलाश मे निकल पड़े , कुछ कदम बढ़े ही थे चाय की दुकान की तरफ, कि पीछे से कुछ अलग सी रोने की आवाज आयी, पीछे नजर पलटी

तो एक बच्चा जो उन स्कूली बच्चो से अलग था, कपकापते हुए चला आ रहा था, यहा तो एक फटी सी shirt, लगभग half pant, धागो से किसी तरह जुड़ी हुई चप्पल, एक हाथ मे ग्लास और दूसरे मे एक पतली सी डोर, और मेरी आंखे तो रोने वाले को देखने के लिए बेचैन थी , तो रोती हुई आवाज को ढूंढते हुए उस बच्चे के हाथ की डोर पर नजर रुकी, फिर बच्चे ने उस डोर को खींचा और आवाज के श्रोत का पता चला । एक छोटा सा पिल्ला ठंड से कपकापते हुए और उ-उ की आवाज निकालते हुए, तेजी से अपनी पुंछ
हिलाते हुए उस बच्चे के कदम से कदम मिलाने की कोशिश मे जल्दी-जल्दी चल रहा था । दोनों जल्द ही दुकान पर पहुचे और बड़ी ही विनम्रता से बच्चे ने ग्लास बढाते हुए दुकानदार से चाय मांगी और पैसे थमाए । चाय मिली और दोनों फिर वापस चल दिये । बच्चे के कपकापते हुए पैर, उस पिल्ले के जल्दी चलने की कोशिश और ठंड से तेज हिलती हुई पुंछ पीछे से दिखते हुए मासूमियत का एहसास दिला रही थी । कुछ ही पल मे कोहरे मे डूबती हुई पूछ आंखो से ओझल होगयी । उस वक़्त वो 5 रुपये की चाय बहुत जुल्मी और महंगी होगयी, गरीबी तू बहुत बेरहमी होगयी ।


No comments:
Post a Comment